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Surrey Mandir. #TrueCovidStory #BihariJiKripa #Mustread #Share #Emotional #Lesson ...#CoronaPostiveturnedouttobenegativebyBiharijigrace ...
समय निकाल कर जरूर पढे
बिहारी जी की कृपा से कोरोना पॉजिटिव निकला कोरना नेगेटिव, दुनिया की सच्चाई देखकर हॉस्पिटल से सीधे वृंदावन निकल पड़े अध्यापक गोपाल जी रास्ते में पुलिस वालों ने रोका तो सच्चाई का पता चला अखबार में छपी थी जिनकी फोटो और लिखा था :-सूचना देने वाले को 40 हजार का ईनाम. उनके साथ था उनका पालतू कुत्ता जिसे वह कभी वृंदावन से लेकर आए थे। आइए जानें पूरी कहानी।

:- भगवन कृष्णा के भगत गोपाल सिंह एक सेवानिवृत अध्यापक हैं। सुबह दस बजे तक ये एकदम स्वस्थ प्रतीत हो रहे थे। शाम के सात बजते- बजते तेज बुखार के साथ-साथ वे सारे लक्षण दिखायी देने लगे, जो एक कोरोना पॉजीटिव मरीज के अंदर दिखाई देते हैं।

परिवार के सदस्यों के चेहरों पर खौफ़ साफ़ दिखाई पड़ रहा था ।

उनकी चारपाई घर के एक पुराने बड़े से बाहरी कमरे में डाल दी गयी, जिसमें इनके पालतू कुत्ते "बिंद्रावन वाले का बसेरा है।

गोपाल जी कुछ साल पहले बांके बिहारी जी की वीआईपी पार्किंग के सामने गाड़ी से टकराकर एक कुत्ता घायल हो गया था छोटा सा घायल पिल्ला सड़क से उठाकर लाये और अपने बच्चे की तरह पालकर इसको नाम दिया "बिंद्रावन वाले!

इस कमरे में अब गोपाल जी, उनकी चारपाई और उनका प्यारा बिंद्रावन वाले हैं।

दोनों बेटों -बहुओं ने दूरी बना ली और बच्चों को भी पास ना जानें के निर्देश दे दिए गयेl

सरकार द्वारा जारी किये गये नंबर पर फोन कर के सूचना दे दी गयी।

खबर मुहल्ले भर में फैल चुकी थी, लेकिन मिलने कोई नहीं आया।

साड़ी के पल्ले से मुँह लपेटे हुए, हाथ में छड़ी लिये पड़ोस की कोई एक बूढी अम्मा आई और गोपाल जी की पत्नी से बोली - "अरे कोई इसके पास दूर से खाना भी सरका दो, वे अस्पताल वाले तो इसे भूखे को ही ले जाएँगे उठा के।"

अब प्रश्न ये था कि उनको खाना देने के लिये कौन जाए ?

बहुओं ने खाना अपनी सास को पकड़ा दियाl

अब गोपाल जी की पत्नी के हाथ, थाली पकड़ते ही काँपने लगे, पैर मानो खूँटे से बाँध दिये गए हों।

इतना देखकर वह पड़ोसन बूढ़ी अम्मा बोली- "अरी तेरा तो पति है, तू भी ........। मुँह बाँध के चली जा और दूर से थाली सरका दे, वो अपने आप उठाकर खा लेगा।"

सारा वार्तालाप गोपाल जी चुपचाप सुन रहे थे, उनकी आँखें नम थी और काँपते होठों से उन्होंने कहा कि-

"कोई मेरे पास ना आये तो बेहतर है, मुझे भूख भी नहीं है।"

इसी बीच एम्बुलेंस आ जाती है और गोपाल जी को एम्बुलेंस में बैठने के लिये बोला जाता है।

गोपाल जी घर के दरवाजे पर आकर एक बार पलटकर अपने घर की तरफ देखते हैं।

पोती -पोते प्रथम तल की खिड़की से मास्क लगाए दादा को निहारते हुए और उन बच्चों के पीछे सर पर पल्लू रखे उनकी दोनों बहुएँ दिखाई पड़ती हैं।

घर के दरवाजे से हटकर बरामदे पर, दोनों बेटे काफी दूर अपनी माँ के साथ खड़े थे।

विचारों का तूफान गोपाल जी के अंदर उमड़ रहा था।

उनकी पोती ने उनकी तरफ हाथ हिलाते हुए टाटा एवं बाई बाई कहा।

एक क्षण को उन्हें लगा कि 'जिंदगी ने अलविदा कह दिया।'

गोपाल जी की आँखें लबलबा उठी।

उन्होंने बैठकर अपने घर की देहरी को चूमा और एम्बुलेंस में जाकर बैठ गये।

उनकी पत्नी ने तुरंत पानी से भरी बाल्टी घर की उस देहरी पर उलेड दी, जिसको गोपाल चूमकर एम्बुलेंस में बैठे थे।

इसे तिरस्कार कहो या मजबूरी, लेकिन ये दृश्य देखकर कुत्ता भी रो पड़ा और उसी एम्बुलेंस के पीछे - पीछे हो लिया, जो गोपाल जी को अस्पताल लेकर जा रही थी।

गोपाल जी अस्पताल में 14 दिनों के अब्ज़र्वेशन पीरियड में रहे।

उनकी सभी जाँच सामान्य थी। उन्हें पूर्णतः स्वस्थ घोषित करके छुट्टी दे दी गयी।

जब वह अस्पताल से बाहर निकले तो उनको अस्पताल के गेट पर उनका कुत्ता बैठा दिखाई दिया ।

दोनों एक दूसरे से लिपट गये। एक की आँखों से गंगा तो एक की आँखों से यमुना बहे जा रही थी।

जब तक उनके बेटों की लम्बी गाड़ी उन्हें लेने पहुँचती, तब तक वो अपने कुत्ते को लेकर किसी दूसरी दिशा की ओर निकल चुके थे।

उसके बाद वो कभी दिखाई नहीं दिये।

आज उनके फोटो के साथ उनकी गुमशुदगी की खबर छपी हैl

*अखबार में लिखा है कि सूचना देने वाले को 40 हजार का ईनाम दिया जायेगा।*

40 हजार - हाँ पढ़कर ध्यान आया कि इतनी ही तो मासिक पेंशन आती थी उनकी, जिसको वो परिवार के ऊपर हँसते गाते उड़ा दिया करते थे।

गांव वालों ने एसपी साहब को कहा...
एक बार गोपाल जी के जगह पर स्वयं को खड़ा करोl

कल्पना करो कि इस कहानी में किरदार आप हो।

आपका सारा अहंकार और सब मोह माया खत्म हो जाएगा।

इसलिए मैं आप सभी से निवेदन करता हूं कि कुछ पुण्य कर्म कर लिया कीजिए l

जीवन में कुछ नहीं है l

कोई अपना नहीं है l

*जब तक स्वार्थ है, तभी तक आपके सब हैं।*

जीवन एक सफ़र है, मौत उसकी मंजिल है l

मोक्ष का द्वार कर्म है।

यही सत्य है ।

शिक्षा:

हे कोरोना, तू पूरी दुनिया में मौत का तांडव कर रहा है पर सचमुच में, तूने जीवन का सार समझा दिया है,

" अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, स्त्री-पुरुष, धर्म-जाति, क्षेत्र-देश, राज़ा-रंक, कोई भेदभाव नहीं, सब एक समान हैं!

असली धर्म इंसानियत है! निस्वार्थ भाव से, निष्काम कर्म, सच्चाई, ईमानदारी, निर्मल प्रेम, मधुर वाणी, सद्भाव, भाईचारा, परोपकार करना ही सर्वश्रेष्ठ है

Take time to read
Corona Postive turned out to be negative by the grace of Bihari ji, seeing the truth of the world, teacher Gopal ji, who came out of Vrindavan directly from the hospital, stopped by the policemen on the way, the truth was revealed in the newspaper whose photo was written and wrote: - To the informer Award of 40 thousand. He was accompanied by his pet dog whom he had once brought from Vrindavan. Let's know the whole story.

: - Bhagat Gopal Singh of Bhagwan Krishna is a retired teacher. By ten in the morning, he looked very healthy. Seven o'clock in the evening, along with high fever, all those symptoms started appearing, which are seen inside a corona positive patient.

Fear was visible on the faces of family members.

His cot was put in an old large outer room in the house, in which his pet dog, "Bindravan Wale" is inhabited.

Gopal ji a few years ago, a dog was injured after hitting a car in front of Banke Bihari ji's VIP parking. A small injured puppy was picked up from the road and brought it up like his child and named it "Bindravan Wale!

In this room now Gopal ji, his cot and his beloved Bindravan are there.

Both sons and sisters made a distance and children were instructed not to know the pass.

Information was given by calling the number issued by the government.

The news had spread across the locality, but no one came to meet.

Wrapped in a sari's leg, a old lady from the neighborhood came to Amma and said to Gopal ji's wife - "Oh, let someone shove food from near it, those hospitalists will take it to the hungry. K. "

Now the question was who would go to give them food?

The daughters-in-law grabbed their mother-in-law.

Now the hands of Gopal ji's wife began to tremble as soon as they held the plate, as if the legs were tied with pegs.

Seeing this, the neighbor said Amma - "Ari is your husband, you are also ........ go away from the dam and shrug the plate from afar, he will pick himself up and eat."

Gopal ji was listening silently, his eyes were moist and with shaking lips he said-

"It's better if no one comes to me, I'm not hungry either."

Meanwhile, an ambulance arrives and Gopal ji is asked to sit in the ambulance.

Gopal ji comes to the door of the house and turns once and looks towards his house.

Granddaughter - Grandson looking at the grandfather wearing a mask from the window of the first floor and both his daughters-in-law are seen on the head behind those children.

On the verandah, moving out of the door of the house, the two sons stood far away with their mother.

A storm of thoughts was rising inside Gopal ji.

His granddaughter said Tata and Bai Bai, shaking hands towards him.

For a moment he felt 'Zindagi has said goodbye'.

Gopal ji's eyes lit up.

He sat down and kissed the door of his house and sat in an ambulance.

His wife immediately poured a bucket full of water at the door of the house, which Gopal kissed and sat in the ambulance.

Call it disdain or helplessness, but seeing this scene, the dog too cried and followed the same ambulance, which was taking Gopalji to the hospital.

Gopal ji stayed in the hospital for a period of 14 days.

All their investigations were normal. He was declared completely healthy and discharged.

When he came out of the hospital, he saw his dog sitting at the gate of the hospital.

Both hug each other. Ganges was flowing from one's eyes and Yamuna was flowing from one's eyes.

By the time his sons' long car arrived to pick him up, he had left for another direction with his dog.

He never appeared after that.

Today the news of his disappearance has appeared with his photo.

* It is written in the newspaper that a reward of 40 thousand will be given to the informer. *

40 thousand - Yes, after reading it came to notice that he used to get the same monthly pension, which he used to throw away singing and laughing at the family.

The villagers told SP Sahab ...
Once, place yourself in the place of Gopal ji.

Imagine that you are the character in this story.

All your ego and all fascination is lost.

Therefore, I request all of you to do some pious work.

There is nothing in life.

No one is his own.

* As long as there is selfishness, only then are you all. *

Life is a journey, death is its destination.

The door to salvation is karma.

This is the truth .

Education:

O Corona, you are worshiping death all over the world, but in reality, you have explained the essence of life,

"Rich-poor, small-big, woman-man, religion-caste, region-country, raza-rank, no discrimination, all are equal!

The real religion is humanity! It is best to do selfless action, honest work, honesty, honesty, pure love, sweet speech, harmony, brotherhood, benevolence
... See MoreSee Less

Surrey Mandir. #TrueCovidStory #BihariJiKripa #Mustread #Share #Emotional #Lesson ...#CoronaPostiveturnedouttobenegativebyBiharijigrace ...
समय निकाल कर जरूर पढे 
बिहारी जी की कृपा से कोरोना पॉजिटिव निकला कोरना नेगेटिव, दुनिया की सच्चाई देखकर हॉस्पिटल से सीधे वृंदावन निकल पड़े अध्यापक गोपाल जी रास्ते में पुलिस वालों ने रोका तो सच्चाई का पता चला अखबार में छपी थी जिनकी फोटो और लिखा था :-सूचना देने वाले को 40 हजार का ईनाम. उनके साथ था उनका पालतू कुत्ता जिसे वह कभी वृंदावन से लेकर आए थे। आइए जानें पूरी कहानी।

:-  भगवन कृष्णा के भगत गोपाल सिंह एक सेवानिवृत अध्यापक हैं।  सुबह दस बजे तक ये एकदम स्वस्थ प्रतीत हो रहे थे। शाम के सात बजते- बजते तेज बुखार के साथ-साथ वे सारे लक्षण दिखायी देने लगे, जो एक कोरोना पॉजीटिव मरीज के अंदर दिखाई देते हैं।

परिवार के सदस्यों के चेहरों पर खौफ़ साफ़ दिखाई पड़ रहा था ।

उनकी चारपाई घर के एक पुराने बड़े से बाहरी कमरे में डाल दी गयी, जिसमें इनके पालतू कुत्ते बिंद्रावन वाले का बसेरा है।

गोपाल जी कुछ साल पहले बांके बिहारी जी की वीआईपी पार्किंग के सामने गाड़ी से टकराकर एक कुत्ता घायल हो गया था छोटा सा घायल पिल्ला सड़क से उठाकर लाये  और अपने बच्चे की तरह पालकर इसको नाम दिया बिंद्रावन वाले! 

इस कमरे में अब  गोपाल जी, उनकी चारपाई और उनका प्यारा बिंद्रावन वाले हैं।

दोनों बेटों -बहुओं ने दूरी बना ली और बच्चों को भी पास ना जानें के निर्देश दे दिए गयेl

सरकार द्वारा जारी किये गये नंबर पर फोन कर के सूचना दे दी गयी।

खबर मुहल्ले भर में फैल चुकी थी, लेकिन मिलने कोई नहीं आया।

साड़ी के पल्ले से मुँह लपेटे हुए, हाथ में छड़ी लिये पड़ोस की कोई एक बूढी अम्मा आई और गोपाल जी की पत्नी से बोली - अरे कोई इसके पास दूर से खाना भी सरका दो, वे अस्पताल वाले तो इसे भूखे को ही ले जाएँगे उठा के।

अब प्रश्न ये था कि उनको खाना देने के लिये कौन जाए ?

बहुओं ने खाना अपनी सास को पकड़ा दियाl

अब गोपाल जी की पत्नी के हाथ, थाली पकड़ते ही काँपने लगे, पैर मानो खूँटे से बाँध दिये गए हों।

इतना देखकर वह पड़ोसन बूढ़ी अम्मा बोली- अरी तेरा तो पति है, तू भी ........। मुँह बाँध के चली जा और दूर से थाली सरका दे, वो अपने आप उठाकर खा लेगा।

सारा वार्तालाप  गोपाल जी चुपचाप सुन रहे थे, उनकी आँखें नम थी और काँपते होठों से उन्होंने कहा कि-

कोई मेरे पास ना आये तो बेहतर है, मुझे भूख भी नहीं है।

इसी बीच एम्बुलेंस आ जाती है और गोपाल जी को एम्बुलेंस में बैठने के लिये बोला जाता है।

गोपाल जी घर के दरवाजे पर आकर एक बार पलटकर अपने घर की तरफ देखते हैं।

पोती -पोते प्रथम तल की खिड़की से मास्क लगाए दादा को निहारते हुए और उन बच्चों के पीछे सर पर पल्लू रखे उनकी दोनों बहुएँ दिखाई पड़ती हैं।

घर के दरवाजे से हटकर बरामदे पर, दोनों बेटे काफी दूर अपनी माँ के साथ खड़े थे।

विचारों का तूफान  गोपाल जी के अंदर उमड़ रहा था।

उनकी पोती ने उनकी तरफ हाथ हिलाते हुए टाटा एवं बाई बाई कहा।

एक क्षण को उन्हें लगा कि जिंदगी ने अलविदा कह दिया।

गोपाल जी की आँखें लबलबा उठी।

उन्होंने बैठकर अपने घर की देहरी को चूमा और एम्बुलेंस में जाकर बैठ गये।

उनकी पत्नी ने तुरंत पानी से भरी बाल्टी घर की उस देहरी पर उलेड दी, जिसको गोपाल चूमकर एम्बुलेंस में बैठे थे।

इसे तिरस्कार कहो या मजबूरी, लेकिन ये दृश्य देखकर कुत्ता भी रो पड़ा और उसी एम्बुलेंस के पीछे - पीछे हो लिया, जो गोपाल जी को अस्पताल लेकर जा रही थी।

गोपाल जी अस्पताल में 14 दिनों के अब्ज़र्वेशन पीरियड में रहे।

उनकी सभी जाँच सामान्य थी। उन्हें पूर्णतः स्वस्थ घोषित करके छुट्टी दे दी गयी।

जब वह अस्पताल से बाहर निकले तो उनको अस्पताल के गेट पर उनका कुत्ता  बैठा दिखाई दिया ।

दोनों एक दूसरे से लिपट गये। एक की आँखों से गंगा तो एक की आँखों से यमुना बहे जा रही थी।

जब तक उनके बेटों की लम्बी गाड़ी उन्हें लेने पहुँचती, तब तक वो अपने कुत्ते को लेकर किसी दूसरी दिशा की ओर निकल चुके थे।

उसके बाद वो कभी दिखाई नहीं दिये।

आज उनके फोटो के साथ उनकी गुमशुदगी की खबर छपी हैl

*अखबार में लिखा है कि सूचना देने वाले को 40 हजार का ईनाम दिया जायेगा।*

40 हजार - हाँ पढ़कर ध्यान आया कि इतनी ही तो मासिक पेंशन आती थी उनकी, जिसको वो परिवार के ऊपर हँसते गाते उड़ा दिया करते थे।

गांव वालों ने एसपी साहब को कहा...
एक बार गोपाल जी के जगह पर स्वयं को खड़ा करोl

कल्पना करो कि इस कहानी में किरदार आप हो।

आपका सारा अहंकार और सब मोह माया खत्म हो जाएगा।

इसलिए मैं आप सभी से निवेदन करता हूं कि कुछ पुण्य कर्म कर लिया कीजिए l

जीवन में कुछ नहीं है l

कोई अपना नहीं है l

*जब तक स्वार्थ है, तभी तक आपके सब हैं।*

जीवन एक सफ़र है, मौत उसकी मंजिल है l

मोक्ष का द्वार कर्म है।

यही सत्य है ।

शिक्षा:

हे कोरोना, तू पूरी दुनिया में मौत का तांडव कर रहा है पर सचमुच में, तूने जीवन का सार समझा दिया है, 

 अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, स्त्री-पुरुष, धर्म-जाति, क्षेत्र-देश, राज़ा-रंक, कोई भेदभाव नहीं, सब एक समान हैं!

असली धर्म इंसानियत है! निस्वार्थ भाव से, निष्काम कर्म, सच्चाई, ईमानदारी, निर्मल प्रेम, मधुर वाणी, सद्भाव, भाईचारा, परोपकार करना ही सर्वश्रेष्ठ है

Take time to read
 Corona Postive  turned out to be negative  by the grace of Bihari ji, seeing the truth of the world, teacher Gopal ji, who came out of Vrindavan directly from the hospital, stopped by the policemen on the way, the truth was revealed in the newspaper whose photo was written and wrote: - To the informer  Award of 40 thousand.  He was accompanied by his pet dog whom he had once brought from Vrindavan.  Lets know the whole story.

 : - Bhagat Gopal Singh of Bhagwan Krishna is a retired teacher.  By ten in the morning, he looked very healthy.  Seven oclock in the evening, along with high fever, all those symptoms started appearing, which are seen inside a corona positive patient.

 Fear was visible on the faces of family members.

 His cot was put in an old large outer room in the house, in which his pet dog, Bindravan Wale is inhabited.

 Gopal ji a few years ago, a dog was injured after hitting a car in front of Banke Bihari jis VIP parking. A small injured puppy was picked up from the road and brought it up like his child and named it Bindravan Wale!

 In this room now Gopal ji, his cot and his beloved Bindravan are there.

 Both sons and sisters made a distance and children were instructed not to know the pass.

 Information was given by calling the number issued by the government.

 The news had spread across the locality, but no one came to meet.

 Wrapped in a saris leg, a old lady from the neighborhood came to Amma and said to Gopal jis wife - Oh, let someone shove food from near it, those hospitalists will take it to the hungry.  K. 

 Now the question was who would go to give them food?

 The daughters-in-law grabbed their mother-in-law.

 Now the hands of Gopal jis wife began to tremble as soon as they held the plate, as if the legs were tied with pegs.

 Seeing this, the neighbor said Amma - Ari is your husband, you are also ........ go away from the dam and shrug the plate from afar, he will pick himself up and eat.

 Gopal ji was listening silently, his eyes were moist and with shaking lips he said-

 Its better if no one comes to me, Im not hungry either.

 Meanwhile, an ambulance arrives and Gopal ji is asked to sit in the ambulance.

 Gopal ji comes to the door of the house and turns once and looks towards his house.

 Granddaughter - Grandson looking at the grandfather wearing a mask from the window of the first floor and both his daughters-in-law are seen on the head behind those children.

 On the verandah, moving out of the door of the house, the two sons stood far away with their mother.

 A storm of thoughts was rising inside Gopal ji.

 His granddaughter said Tata and Bai Bai, shaking hands towards him.

 For a moment he felt Zindagi has said goodbye.

 Gopal jis eyes lit up.

 He sat down and kissed the door of his house and sat in an ambulance.

 His wife immediately poured a bucket full of water at the door of the house, which Gopal kissed and sat in the ambulance.

 Call it disdain or helplessness, but seeing this scene, the dog too cried and followed the same ambulance, which was taking Gopalji to the hospital.

 Gopal ji stayed in the hospital for a period of 14 days.

 All their investigations were normal.  He was declared completely healthy and discharged.

 When he came out of the hospital, he saw his dog sitting at the gate of the hospital.

 Both hug each other.  Ganges was flowing from ones eyes and Yamuna was flowing from ones eyes.

 By the time his sons long car arrived to pick him up, he had left for another direction with his dog.

 He never appeared after that.

 Today the news of his disappearance has appeared with his photo.

 * It is written in the newspaper that a reward of 40 thousand will be given to the informer. *

 40 thousand - Yes, after reading it came to notice that he used to get the same monthly pension, which he used to throw away singing and laughing at the family.

 The villagers told SP Sahab ...
 Once, place yourself in the place of Gopal ji.

 Imagine that you are the character in this story.

 All your ego and all fascination is lost.

 Therefore, I request all of you to do some pious work.

 There is nothing in life.

 No one is his own.

 * As long as there is selfishness, only then are you all. *

 Life is a journey, death is its destination.

 The door to salvation is karma.

 This is the truth .

 Education:

 O Corona, you are worshiping death all over the world, but in reality, you have explained the essence of life,

 Rich-poor, small-big, woman-man, religion-caste, region-country, raza-rank, no discrimination, all are equal!

 The real religion is humanity!  It is best to do selfless action, honest work, honesty, honesty, pure love, sweet speech, harmony, brotherhood, benevolence

7 hours ago

Lakshmi Narayan Mandir, Surrey

Surrey Mandir
Live Morning Aarti & Darshan’s
#JaiLakshmiNaryanBhagwan ll May 29 ll
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8 hours ago

Lakshmi Narayan Mandir, Surrey

Surrey Mandir
Live Morning Darshan & Aarti #ShivMandir
#JaiBholenath ll May 29 ll Friday ll
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Surrey Mandir #nirjalaekadshi #June 01 #monday #namaniekadshivrat #read...
. #निर्जलाएकादशी (उत्तर अमेरिकी समय क्षेत्र के अनुसार #जून 1,2020 सोमवार) अन्य एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण है। यह सबसे पवित्र वैदिक (हिंदू) अवसर है जो भगवान विष्णु को समर्पित है और पारंपरिक हिंदू कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ के महीने में 11 वें चंद्र दिवस (या एकादशी) को मनाया जाता है।
निर्जला का अर्थ है जल रहित या बिना जल के और निर्जला एकादशी का व्रत बिना जल या किसी भी प्रकार के भोजन के साथ मनाया जाता है। अपने सख्त उपवास नियमों के कारण, निर्जला एकादशी व्रतम सभी एकादशी व्रतों में सबसे कठिन है। हालाँकि अगर धार्मिक रूप से देखा जाए तो यह सबसे पुरस्कृत अवसरों में से एक है। यह व्रत सब से कठिन है। कट्टर विष्णु भक्त इस व्रत को करते हैं, और वे दिन में उपवास करते समय पानी या कोई भी भोजन नहीं करते हैं। एकादशी सूर्योदय से शुरू होता है और अगले दिन (द्वादशी) सूर्योदय पर समाप्त होता है।

ऐसा माना जाता है कि निर्जला एकादशी का पालन करना भी तीर्थ यात्रा पर जाने के बराबर है। लोगों का मानना ​​है कि इस व्रत के पालनकर्ता, मृत्यु के बाद, वैकुंठ से दूतों द्वारा प्राप्त होते हैं, विष्णु के निवास और मृत्यु के देवता यम द्वारा नहीं। जो लोग एक वर्ष में अन्य चौबीस एकादशी व्रत का पालन करने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें निर्जला एकादशी पर व्रत का पालन करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि निर्जला एकादशी पर एक व्रत का पालन करने से एक वर्ष में सभी चौबीस एकादशी उपवासों का आशीर्वाद और लाभ प्राप्त होता है।

Nir-jala means water-less or without water and the fasting on Nirjala Ekadashi is observed without water or any type of food. Due to its strict fasting rules, Nirjala Ekadashi Vratam is the hardest amongst all Ekadashi Vrats. However if observed religiously, it is one of the most rewarding occasions. This fast is the strictest of all. Staunch Vishnu devotees undertake this fast, and they do not drink water or any food while fasting on the day. The fast begins on Ekadasi sunrise and ends on next day (Dwadasi) sunrise.

It is believed that observing Nirjala Ekadashi is also equal to going on pilgrimage. People believe that observers of this fast, after death, are received by messengers from Vaikunta, abode of Vishnu and not by Yama, the god of death. Those who are not able to follow the other twenty four Ekadashi fasting in a year must observe a fast on Nirjala Ekadashi. It is believed that observing a single fast on Nirjala Ekadashi bestows the blessings and benefits of all twenty four Ekadashi fasting in a year.
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Surrey Mandir #NirjalaEkadshi #June 01 #Monday #NamaniEkadshiVrat #Read...
.  #निर्जलाएकादशी (उत्तर अमेरिकी समय क्षेत्र के अनुसार #जून 1,2020 सोमवार) अन्य एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण है।  यह सबसे पवित्र वैदिक (हिंदू) अवसर है जो भगवान विष्णु को समर्पित है और पारंपरिक हिंदू कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ के महीने में 11 वें चंद्र दिवस (या एकादशी) को मनाया जाता है।
 निर्जला का अर्थ है जल रहित या बिना जल के और निर्जला एकादशी का व्रत बिना जल या किसी भी प्रकार के भोजन के साथ मनाया जाता है।  अपने सख्त उपवास नियमों के कारण, निर्जला एकादशी व्रतम सभी एकादशी व्रतों में सबसे कठिन है।  हालाँकि अगर धार्मिक रूप से देखा जाए तो यह सबसे पुरस्कृत अवसरों में से एक है।  यह व्रत सब से कठिन है।  कट्टर विष्णु भक्त इस व्रत को करते हैं, और वे दिन में उपवास करते समय पानी या कोई भी भोजन नहीं करते हैं।  एकादशी सूर्योदय से शुरू होता है और अगले दिन (द्वादशी) सूर्योदय पर समाप्त होता है।

 ऐसा माना जाता है कि निर्जला एकादशी का पालन करना भी तीर्थ यात्रा पर जाने के बराबर है।  लोगों का मानना ​​है कि इस व्रत के पालनकर्ता, मृत्यु के बाद, वैकुंठ से दूतों द्वारा प्राप्त होते हैं, विष्णु के निवास और मृत्यु के देवता यम द्वारा नहीं।  जो लोग एक वर्ष में अन्य चौबीस एकादशी व्रत का पालन करने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें निर्जला एकादशी पर व्रत का पालन करना चाहिए।  ऐसा माना जाता है कि निर्जला एकादशी पर एक व्रत का पालन करने से एक वर्ष में सभी चौबीस एकादशी उपवासों का आशीर्वाद और लाभ प्राप्त होता है।

Nir-jala means water-less or without water and the fasting on Nirjala Ekadashi is observed without water or any type of food. Due to its strict fasting rules, Nirjala Ekadashi Vratam is the hardest amongst all Ekadashi Vrats. However if observed religiously, it is one of the most rewarding occasions. This fast is the strictest of all. Staunch Vishnu devotees undertake this fast, and they do not drink water or any food while fasting on the day. The fast begins on Ekadasi sunrise and ends on next day (Dwadasi) sunrise.   

It is believed that observing Nirjala Ekadashi is also equal to going on pilgrimage. People believe that observers of this fast, after death, are received by messengers from Vaikunta, abode of Vishnu and not by Yama, the god of death. Those who are not able to follow the other twenty four Ekadashi fasting in a year must observe a fast on Nirjala Ekadashi. It is believed that observing a single fast on Nirjala Ekadashi bestows the blessings and benefits of all twenty four Ekadashi fasting in a year.

Surrey Mandir
Live Maa Ganga Aarti Haridwar
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Surrey Mandir
Live Maa Vaishno Devi Aarti
#JaiMataDi
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Surrey Mandir #SantTukaRam part - 3
संत तुकाराम - एक महान भक्त - भाग 3

उन्होंने उस मंदिर का पुनर्निर्माण किया जो अस्त-व्यस्त हो गया था और अपना पूरा समय नाम कीर्तन में बिताने लगे। उसका मन अब कुल समर्पण से स्थिर था।

अपनी संपूर्ण भक्ति के परिणामस्वरूप, तुकाराम को गुरु उपाध्याय के साथ पुरस्कृत किया गया था।

जैसा कि बुजुर्ग कहते हैं, सद्गुरु ने एक सपने में तुकाराम का दौरा किया। तुकाराम इसका वर्णन करते हैं, उनके जीवन की सबसे बड़ी घटना के रूप में, इस प्रकार “सदगुरु मेरे लिए एक सपने में आए और वास्तव में मेरे लिए बहुत दयालु थे, हालांकि मैंने इसके लायक कुछ भी नहीं किया था। वह मुझसे तब मिला जब मैं स्नान के लिए नदी जा रहा था और उसने मेरे सिर पर हाथ रखा और मुझे आशीर्वाद दिया और मुझे जप करने की सलाह दी।… .जय जय जय रामकृष्ण हरि। तुकाराम का आनंद कोई सीमा नहीं जानता था।

तुकाराम ने अपना जीवन भक्ति प्रथाओं में अधिक से अधिक बिताना शुरू कर दिया, महान संत ज्ञानदेव, नामदेव और एकनाथ के कार्यों का अध्ययन इस प्रकार कलम अभंग (भजन) से प्रेरित हो गया।

जब भी तुकाराम ने कीर्तन करना शुरू किया, लोगों ने बड़ी संख्या में उन्हें एक वास्तविक संत के रूप में मानना ​​शुरू कर दिया और उन्हें पूरा सम्मान दिया।

यह उन लोगों की एक छोटी संख्या से नाराज था जिन्होंने तुकाराम के खिलाफ रामेश्वर शास्त्री को उस समय के दौरान एक विद्वान विद्वान के रूप में माना जाने वाली रिपोर्ट भेजी थी। समाज में खड़े होने के कारण, उन्होंने तुकाराम को उन सभी गतिविधियों को रोकने के लिए मजबूर किया जो उनके कीर्तन के कारण भीड़ को खींच लेंगे। उन्होंने उसे निर्देश दिया कि वे पेनिंग एब्स को बंद कर दें और उन्हें पास की इंद्रायणी नदी में फेंक दिया जाए।

तुकाराम ने सभी बुजुर्गों को बड़ी श्रद्धा के साथ रखा। वो दुखी था। उसने तुरंत अपने घर से सभी कामों को अंजाम दिया, उन्हें एक साथ बांधा, एक बड़े पत्थर को गठरी से बांध दिया, और गाँव के बुजुर्गों की मौजूदगी में उसे नदी में फेंक दिया।

तुकाराम के दुश्मन, जो उससे ईर्ष्या करते थे, बहुत खुश थे। तुकाराम ने उनके तानों का बुरा नहीं माना। उन्होंने सोचा, "क्या यह महज एक बड़ा अपराध है कि भगवान की स्तुति को अपने अभंगों में गाते हुए, जैसा कि स्वयं भगवान ने सलाह दी है?"

निर्वासित, तुकाराम ने इंद्रायणी नदी के तट पर बैठकर भगवान पांडुरंगा से प्रार्थना की कि वे उन्हें क्षमा करें और कुछ रास्ता दिखाएं क्योंकि नाम संकीर्तन ही उनका जीवन था। तेरह लंबे दिनों के लिए वह इस तरह पानी, भोजन या नींद के बिना अप्रभावित बैठे रहे और प्रभु से मार्गदर्शन मांगते रहे।

Sant Tukaram - A Great Devotee - Part 3

He reconstructed the temple which had fallen into disrepair and began to spend his entire time in Nama Kirtan. His mind was now steady with total surrender.

As a result of his whole-hearted devotion, Tukaram was rewarded with Guru Upadesh.

As elders say, SadGuru visited Tukaram in a dream. Tukaram describes this, as the greatest event of his life, thus “The Sadguru came to me in a dream and was really very kind to me, though I had done nothing to deserve it. He met me when I was going to the river for a bath and placed his hand on my head and blessed me and advised me to do Japa …….of Jai jai Ramakrishna Hari. Tukaram’s joy knew no bounds.

Tukaram began to spend his life more and more in devotional practices, study of the works of great saints Jnanadev, Namdev and Ekanath thus getting inspired to pen Abhangs (bhajans).

Whenever Tukaram began to perform Kirtan, people began to flock in large numbers considering him as a realised saint and gave him all the respect.

This was resented by a small number of people who sent a report against Tukaram to Rameshwar Shastri regarded as a learned Scholar during those times. Due to his standing in society , he forced Tukaram to stop all those activities which will pull crowds due to his kirtans. He instructed him to stop penning abhangs and they should be dumped in the nearby Indrayani river.

Tukaram held all elders in great reverence. He was sad. He immediately brought out of his home all the works , bound them together, tied a big stone round the bundle, and threw it into the river in presence of the village elders.

Tukaram’s enemies, who were jealous of him, were greatly pleased. Tukaram did not mind their taunts. He thought, “Is it a big offense for merely, singing the praise of Lord in his abhangs as advised by Lord Himself?”

Dejected , Tukaram sat on the bank of the river Indrayani praying to Lord Panduranga to forgive him and show some way out as Naama sanKirtan was his life. For thirteen long days he thus sat unmoved without water, food or sleep seeking Lord’s guidance .

To continue.....
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Surrey Mandir #SantTukaRam part - 3
संत तुकाराम - एक महान भक्त - भाग 3

 उन्होंने उस मंदिर का पुनर्निर्माण किया जो अस्त-व्यस्त हो गया था और अपना पूरा समय नाम कीर्तन में बिताने लगे।  उसका मन अब कुल समर्पण से स्थिर था।

 अपनी संपूर्ण भक्ति के परिणामस्वरूप, तुकाराम को गुरु उपाध्याय के साथ पुरस्कृत किया गया था।

 जैसा कि बुजुर्ग कहते हैं, सद्गुरु ने एक सपने में तुकाराम का दौरा किया।  तुकाराम इसका वर्णन करते हैं, उनके जीवन की सबसे बड़ी घटना के रूप में, इस प्रकार “सदगुरु मेरे लिए एक सपने में आए और वास्तव में मेरे लिए बहुत दयालु थे, हालांकि मैंने इसके लायक कुछ भी नहीं किया था।  वह मुझसे तब मिला जब मैं स्नान के लिए नदी जा रहा था और उसने मेरे सिर पर हाथ रखा और मुझे आशीर्वाद दिया और मुझे जप करने की सलाह दी।… .जय जय जय रामकृष्ण हरि।  तुकाराम का आनंद कोई सीमा नहीं जानता था।

 तुकाराम ने अपना जीवन भक्ति प्रथाओं में अधिक से अधिक बिताना शुरू कर दिया, महान संत ज्ञानदेव, नामदेव और एकनाथ के कार्यों का अध्ययन इस प्रकार कलम अभंग (भजन) से प्रेरित हो गया।

 जब भी तुकाराम ने कीर्तन करना शुरू किया, लोगों ने बड़ी संख्या में उन्हें एक वास्तविक संत के रूप में मानना ​​शुरू कर दिया और उन्हें पूरा सम्मान दिया।

 यह उन लोगों की एक छोटी संख्या से नाराज था जिन्होंने तुकाराम के खिलाफ रामेश्वर शास्त्री को उस समय के दौरान एक विद्वान विद्वान के रूप में माना जाने वाली रिपोर्ट भेजी थी।  समाज में खड़े होने के कारण, उन्होंने तुकाराम को उन सभी गतिविधियों को रोकने के लिए मजबूर किया जो उनके कीर्तन के कारण भीड़ को खींच लेंगे।  उन्होंने उसे निर्देश दिया कि वे पेनिंग एब्स को बंद कर दें और उन्हें पास की इंद्रायणी नदी में फेंक दिया जाए।

 तुकाराम ने सभी बुजुर्गों को बड़ी श्रद्धा के साथ रखा।  वो दुखी था।  उसने तुरंत अपने घर से सभी कामों को अंजाम दिया, उन्हें एक साथ बांधा, एक बड़े पत्थर को गठरी से बांध दिया, और गाँव के बुजुर्गों की मौजूदगी में उसे नदी में फेंक दिया।

 तुकाराम के दुश्मन, जो उससे ईर्ष्या करते थे, बहुत खुश थे।  तुकाराम ने उनके तानों का बुरा नहीं माना।  उन्होंने सोचा, क्या यह महज एक बड़ा अपराध है कि भगवान की स्तुति को अपने अभंगों में गाते हुए, जैसा कि स्वयं भगवान ने सलाह दी है?

 निर्वासित, तुकाराम ने इंद्रायणी नदी के तट पर बैठकर भगवान पांडुरंगा से प्रार्थना की कि वे उन्हें क्षमा करें और कुछ रास्ता दिखाएं क्योंकि नाम संकीर्तन ही उनका जीवन था।  तेरह लंबे दिनों के लिए वह इस तरह पानी, भोजन या नींद के बिना अप्रभावित बैठे रहे और प्रभु से मार्गदर्शन मांगते रहे।

Sant Tukaram - A Great Devotee - Part 3

He reconstructed the temple which had fallen into disrepair and began to spend his  entire time in  Nama Kirtan. His mind  was  now steady with total surrender.

As a result of his whole-hearted devotion, Tukaram was rewarded with Guru Upadesh.

As elders say, SadGuru visited  Tukaram  in a dream. Tukaram describes this, as the greatest event of his life, thus “The Sadguru came to me in a dream and was really very kind to me, though I had done nothing to deserve it. He met me when I was going to the river for a bath and placed his hand on my head and blessed me  and advised me to do Japa …….of  Jai jai Ramakrishna Hari. Tukaram’s joy knew no bounds.

Tukaram began to spend his life more and more in devotional practices, study of the  works of  great saints Jnanadev, Namdev and Ekanath thus getting inspired to pen Abhangs (bhajans).

Whenever Tukaram began to perform  Kirtan, people began to flock in large numbers considering  him as a  realised saint and gave  him all the  respect.

This was resented by a small number of people  who sent a report against Tukaram to Rameshwar Shastri  regarded as a learned Scholar during those  times. Due to his standing in society , he forced Tukaram to stop all those activities which will pull crowds due to his kirtans. He instructed him to stop  penning abhangs and they  should be dumped in the  nearby Indrayani river.

Tukaram held all  elders  in great reverence. He was sad. He immediately brought out of his home all the  works , bound them together, tied a big stone round the bundle, and threw it into the river in presence of the village elders.

Tukaram’s enemies, who were jealous of him, were greatly pleased. Tukaram did not mind their taunts. He thought, “Is it a big offense for merely, singing the praise of Lord in his  abhangs as advised by Lord Himself?”

Dejected , Tukaram  sat on the bank of the river Indrayani praying  to  Lord Panduranga to forgive him and show some way out as  Naama sanKirtan was his life. For thirteen long  days he thus sat unmoved  without water, food or sleep seeking Lord’s guidance .

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Surrey Mandir
Write names of Krishna starting with letter A, B ,C & D.
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Surrey Mandir
#Very nice to see how students of Vedic Hindi school Lakshmi Naryan Mandir & Mandir Devotees creative during COVId 19 stayHome time ..

#Share/tag your kids painting linked to Religious , community & culture #Have down during School off time.

Credit goes Drgeeta Sharma .. for sharing beautiful krishna’s painted by her daughter .
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20 hours ago

Lakshmi Narayan Mandir, Surrey

Surrey Mandir
Live Evening Bhog Aarti & Darshan’s
#JaiLakshmiNaryanBhagwan ll May 28 ll
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20 hours ago

Lakshmi Narayan Mandir, Surrey

Surrey Mandir
Live Evening Bhog Aarti & Darshan
#ShivMandir #JaiBholenath ll May 28 ll
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1 day ago

Lakshmi Narayan Mandir, Surrey

Surrey Mandir
Live Morning Aarti & Darshan
#Jailakshminaryanbhagwan ll May 28 ll
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1 day ago

Lakshmi Narayan Mandir, Surrey

Surreymandir
Live Morning Aarti & Darshan
#ShivMandir #Jaibholenath ll May 28 ll
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Surrey Mandir #माता लक्ष्मी की कथा #StoryofMataLakshmi #AmazingStory #Mustread .. #write in comment #JaiMaaLakshmi...
एक बूढ़ा ब्राह्मण था वह रोज पीपल को जल से सींचता था. पीपल में से रोज एक लड़की निकलती और कहती पिताजी मैं आपके साथ जाऊँगी. यह सुनते-सुनते बूढ़ा दिन ब दिन कमजोर होने लगा तो बुढ़िया ने पूछा की क्या बात है? बूढ़ा बोला कि पीपल से एल लड़की निकलती है और कहती है कि वह भी मेरे साथ चलेगी. बुढ़िया बोली की कल ले आना उस लड़की को जहाँ छ: लड़कियाँ पहले से ही हमारे घर में है वहाँ सातवीं लड़की और सही.
अगले दिन बूढ़ा उस लड़की को घर ले आया. घर लाने के बाद बूढ़ा आटा माँगने गया तो उसे पहले दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा आटा मिला था. जब बुढ़िया वह आटा छानने लगी तो लड़की ने कहा कि लाओ माँ, मैं छान देती हूँ. जब वह आटा छानने बैठी तो परात भर गई. उसके बाद माँ खाना बनाने जाने लगी तो लड़की बोली की आज रसोई में मैं जाऊँगी तो बुढ़िया बोली कि ना, तेरे हाथ जल जाएँगे लेकिन लड़की नहीं मानी और वह रसोई में खाना बनाने गई तो उसने तरह-तरह के छत्तीसों व्यंजन बना डाले और आज सभी ने भरपेट खाना खाया. इससे पहले वह आधा पेट भूखा ही रहते थे.
रात हुई तो बुढ़िया का भाई आया और कहने लगा कि दीदी मैं तो खाना खाऊँगा. बुढ़िया परेशान हो गई कि अब खाना कहाँ से लाएगी. लड़की ने पूछा की माँ क्या बात है? उसने कहा कि तेरा मामा आया है और रोटी खाएगा लेकिन रोटी तो सबने खा ली है अब उसके लिए कहाँ से लाऊँगी. लड़की बोली कि मैं बना दूँगी और वह रसोई में गई और मामा के लिए छत्तीसों व्यंजन बना दिए. मामा ने भरपेट खाया और कहा भी कि ऎसा खाना इससे पहले उसने कभी नहीं खाया है. बुढ़िया ने कहा कि भाई तेरी पावनी भाँजी है उसी ने बनाया है.
शाम हुई तो लड़की बोली कि माँ चौका लगा के चौके का दीया जला देना, कोठे में मैं सोऊँगी. बुढ़िया बोली कि ना बेटी तू डर जाएगी लेकिन वह बोली कि ना मैं ना डरुँगी, मैं अंदर कोठे में ही सोऊँगी. चह कोठे में ही जाकर सो गई. आधी रात को लड़की उठी और चारों ओर आँख मारी तो धन ही धन हो गया. वह बाहर जाने लगी तो एक बूढ़ा ब्राह्मण सो रहा था. उसने देखा तो कहा कि बेटी तू कहाँ चली? लड़की बोली कि मैं तो दरिद्रता दूर करने आई थी. अगर तुम्हें दूर करवानी है तो करवा लो. उसने बूढे के घर में भी आँख से देखा तो चारों ओर धन ही धन हो गया.
सुबह सवेरे सब उठे तो लड़की को ना पाकर उसे ढूंढने लगे कि पावनी बेटी कहां चली गई. बूढ़ा ब्राह्मण बोला कि वह तो लक्ष्मी माता थी जो तुम्हारे साथ मेरी दरिद्रता भी दूर कर गई. हे लक्ष्मी माता ! जैसे आपने उनकी दरिद्रता दूर की वैसे ही सबकी करना.
#Story of Mother Lakshmi
There was an old Brahmin who used to irrigate Peepal with water every day. Every day a girl came out of Peepal and said, "Father, I will go with you." Hearing this, the old man started getting weaker day by day, then the old lady asked what is the matter? The old man said that L girl comes out from Peepal and says that she will also go with me. The old lady said, bring the girl tomorrow, where the six girls are already in our house, there is the seventh girl and right.
The next day the old man brought the girl home. After bringing home, the old man went to ask for flour, so he got more flour today than in the first days. When the old lady started filtering the flour, the girl said, "Bring mother, I filter." When she sat down to filter the flour, the bowl was full. After that, when the mother started going to cook, the girl said that if I go to the kitchen today, the old lady said that, your hands will be burnt but the girl did not listen and she went to cook in the kitchen, then she made thirty-six different kinds of dishes and today all Ate a lot of food Earlier, he used to stay half hungry.
It was night, the old lady's brother came and said, "Didi, I will eat food." The old lady got upset that from where will she bring food now. The girl asked, what is the mother? He said that your maternal uncle has come and will eat the bread, but everyone has eaten the bread, from where will I get it for him. The girl said that I will make and she went to the kitchen and made thirty-six dishes for the maternal uncle. Mama ate very well and said that she has never eaten such food before. The old lady said that her brother is your niece, she has made it.
In the evening, the girl said, "Mother put a lamp to burn the lamp of the square, I will sleep in the room." The old lady said that you will not be afraid, but she said that I will not be afraid, I will sleep inside the room. Chaht went to sleep in the room. In the middle of the night, the girl woke up and turned her eyes all around, and wealth became wealth. When she started going out, an old Brahmin was sleeping. When he saw it, he said, "Where did you go, daughter?" The girl said that I had come to remove poverty. Get it done if you want to get it removed. When he saw with his eyes even in the old man's house, there was wealth all around.
When everyone woke up in the morning, when they could not find the girl, they started searching for where the daughter of their daughter had gone. The old Brahmin said that she was Lakshmi Mata who removed my poverty with you. Hey Lakshmi Mata! As you have overcome their poverty, do it all.
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Surrey Mandir #माता लक्ष्मी की कथा #StoryofMataLakshmi #AmazingStory #Mustread .. #write in comment #JaiMaaLakshmi...
एक बूढ़ा ब्राह्मण था वह रोज पीपल को जल से सींचता था. पीपल में से रोज एक लड़की निकलती और कहती पिताजी मैं आपके साथ जाऊँगी. यह सुनते-सुनते बूढ़ा दिन ब दिन कमजोर होने लगा तो बुढ़िया ने पूछा की क्या बात है? बूढ़ा बोला कि पीपल से एल लड़की निकलती है और कहती है कि वह भी मेरे साथ चलेगी. बुढ़िया बोली की कल ले आना उस लड़की को जहाँ छ: लड़कियाँ पहले से ही हमारे घर में है वहाँ सातवीं लड़की और सही.
अगले दिन बूढ़ा उस लड़की को घर ले आया. घर लाने के बाद बूढ़ा आटा माँगने गया तो उसे पहले दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा आटा मिला था. जब बुढ़िया वह आटा छानने लगी तो लड़की ने कहा कि लाओ माँ, मैं छान देती हूँ. जब वह आटा छानने बैठी तो परात भर गई. उसके बाद माँ खाना बनाने जाने लगी तो लड़की बोली की आज रसोई में मैं जाऊँगी तो बुढ़िया बोली कि ना, तेरे हाथ जल जाएँगे लेकिन लड़की नहीं मानी और वह रसोई में खाना बनाने गई तो उसने तरह-तरह के छत्तीसों व्यंजन बना डाले और आज सभी ने भरपेट खाना खाया. इससे पहले वह आधा पेट भूखा ही रहते थे.
रात हुई तो बुढ़िया का भाई आया और कहने लगा कि दीदी मैं तो खाना खाऊँगा. बुढ़िया परेशान हो गई कि अब खाना कहाँ से लाएगी. लड़की ने पूछा की माँ क्या बात है? उसने कहा कि तेरा मामा आया है और रोटी खाएगा लेकिन रोटी तो सबने खा ली है अब उसके लिए कहाँ से लाऊँगी. लड़की बोली कि मैं बना दूँगी और वह रसोई में गई और मामा के लिए छत्तीसों व्यंजन बना दिए. मामा ने भरपेट खाया और कहा भी कि ऎसा खाना इससे पहले उसने कभी नहीं खाया है. बुढ़िया ने कहा कि भाई तेरी पावनी भाँजी है उसी ने बनाया है.
शाम हुई तो लड़की बोली कि माँ चौका लगा के चौके का दीया जला देना, कोठे में मैं सोऊँगी. बुढ़िया बोली कि ना बेटी तू डर जाएगी लेकिन वह बोली कि ना मैं ना डरुँगी, मैं अंदर कोठे में ही सोऊँगी. चह कोठे में ही जाकर सो गई. आधी रात को लड़की उठी और चारों ओर आँख मारी तो धन ही धन हो गया. वह बाहर जाने लगी तो एक बूढ़ा ब्राह्मण सो रहा था. उसने देखा तो कहा कि बेटी तू कहाँ चली? लड़की बोली कि मैं तो दरिद्रता दूर करने आई थी. अगर तुम्हें दूर करवानी है तो करवा लो. उसने बूढे के घर में भी आँख से देखा तो चारों ओर धन ही धन हो गया.
सुबह सवेरे सब उठे तो लड़की को ना पाकर उसे ढूंढने लगे कि पावनी बेटी कहां चली गई. बूढ़ा ब्राह्मण बोला कि वह तो लक्ष्मी माता थी जो तुम्हारे साथ मेरी दरिद्रता भी दूर कर गई. हे लक्ष्मी माता ! जैसे आपने उनकी दरिद्रता दूर की वैसे ही सबकी करना.
#Story of Mother Lakshmi
 There was an old Brahmin who used to irrigate Peepal with water every day.  Every day a girl came out of Peepal and said, Father, I will go with you.  Hearing this, the old man started getting weaker day by day, then the old lady asked what is the matter?  The old man said that L girl comes out from Peepal and says that she will also go with me.  The old lady said, bring the girl tomorrow, where the six girls are already in our house, there is the seventh girl and right.
 The next day the old man brought the girl home.  After bringing home, the old man went to ask for flour, so he got more flour today than in the first days.  When the old lady started filtering the flour, the girl said, Bring mother, I filter.  When she sat down to filter the flour, the bowl was full.  After that, when the mother started going to cook, the girl said that if I go to the kitchen today, the old lady said that, your hands will be burnt but the girl did not listen and she went to cook in the kitchen, then she made thirty-six different kinds of dishes and today all  Ate a lot of food  Earlier, he used to stay half hungry.
 It was night, the old ladys brother came and said, Didi, I will eat food.  The old lady got upset that from where will she bring food now.  The girl asked, what is the mother?  He said that your maternal uncle has come and will eat the bread, but everyone has eaten the bread, from where will I get it for him.  The girl said that I will make and she went to the kitchen and made thirty-six dishes for the maternal uncle.  Mama ate very well and said that she has never eaten such food before.  The old lady said that her brother is your niece, she has made it.
 In the evening, the girl said, Mother put a lamp to burn the lamp of the square, I will sleep in the room.  The old lady said that you will not be afraid, but she said that I will not be afraid, I will sleep inside the room.  Chaht went to sleep in the room.  In the middle of the night, the girl woke up and turned her eyes all around, and wealth became wealth.  When she started going out, an old Brahmin was sleeping.  When he saw it, he said, Where did you go, daughter?  The girl said that I had come to remove poverty.  Get it done if you want to get it removed.  When he saw with his eyes even in the old mans house, there was wealth all around.
 When everyone woke up in the morning, when they could not find the girl, they started searching for where the daughter of their daughter had gone.  The old Brahmin said that she was Lakshmi Mata who removed my poverty with you.  Hey Lakshmi Mata!  As you have overcome their poverty, do it all.

Surrey Mandir #Santtukaram Part 2
संत तुकाराम - एक महान भक्त - भाग २
अपने व्यवहार को देखकर, तुकाराम को घर से दूर जाने पर कुछ भी मूल्यवान नहीं सौंपा गया था।

तुकाराम की पत्नी जीजाबाई ने उन्हें अपने गाँव में एक छोटी सी दुकान स्थापित करने में बार-बार मदद की, लेकिन वह तुकाराम द्वारा हमेशा आश्वस्त थीं कि सभी प्राणियों की सेवा करना, चाहे वह किसी भी मनुष्य, पशु, कीड़े आदि का एकमात्र लक्ष्य था।

तुकाराम कीर्तन करते हुए दुकान में बैठते थे और अपने ग्राहकों के प्रति बहुत दयालु और ईमानदार थे। हमेशा की तरह अपने साथी मनुष्यों पर दया करने के कारण, वह बहुत जल्द ही दिवालिया हो गया, क्योंकि उसने कभी अपने और परिवार के बारे में नहीं सोचा।

संत तुकाराम ने भगवान पांडुरंगा को सभी प्राणियों में देखा। एक बार उन्हें एक मकई के खेत की रखवाली करने के लिए कहा गया। उन्हें यह नौकरी पसंद थी क्योंकि यह भगवान पांडुरंगा पर नामकीर्तन की उनकी आदत में बाधा नहीं थी। पक्षी मानव उपस्थिति को देखते थे और कॉर्न्स को छूने के बिना उड़ जाते थे।

लेकिन जैसे ही तुकाराम अपने अभंगों में डूबे, पक्षियों ने कॉर्न्स पर भोजन करना शुरू कर दिया। सभी पक्षियों में पांडुरंगा को देखकर, उन्होंने पक्षियों को डराने के बजाय, पक्षियों को उस खेत से और अधिक मकानों के साथ खिलाया, जो वह पहरा दे रहे थे, इस प्रकार मालिक का क्रोध बढ़ रहा था।

1629 और 1630 के वर्षों के दौरान, देश गंभीर अकाल का सामना कर रहा था। यह सबसे कठिन अवधि थी परिवार के लिए वचन पत्र ऋण के मृत पत्र बन गए क्योंकि अकाल के दौरान कुछ भी महसूस नहीं किया जा सकता था।

तुकाराम ने अपने लोगों और मवेशियों को खो दिया। बहुत परेशान होकर वह पास के भामनाथ वन में गया। पंद्रह दिनों तक वह बिना किसी बुनियादी ज़रूरत के परमपिता परमात्मा का ध्यान करता रहा।

उन्होंने अपने ज्ञान के साथ सच्चे ज्ञान का एहसास किया। रहस्योद्घाटन ने तुकाराम को अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में अधिक जागरूक बना दिया। उन्होंने धीरे-धीरे अपने घर, पत्नी और संबंधों के लिए अपने प्यार को वापस ले लिया।

उसने सभी वचन पत्र एकत्र किए और अपने रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद, इंद्रायणी नदी में फेंक दिया।

Sant Tukaram - A great devotee - Part 2

Seeing his behaviour, Tukaram was not entrusted with anything valuable when he went far from home.

Tukaram’s wife Jijabai helped him again and again to set up a small shop in his own village, but she was always convinced by Tukaram that serving all the beings, no matter it was fellow human beings , animals, insects etc was his only goal .

Tukaram used to sit in the shop doing kirtan and being very kind and honest to his customers. As usual due to his compassion to his fellow humans, he became bankrupt very soon as he never thought of himself and family .

Sant Tukaram saw Lord Panduranga in all creatures. Once he was asked to guard a corn field. He liked this job as it did not hinder with his habit of Namakirtan on Lord Panduranga. The birds would see human presence and fly away without touching the corns.

But as Tukaram got immersed in his abhangs, the birds started to feed on the corns. Seeing Panduranga in all the birds, he, instead of scaring the birds away, fed the birds with more corns from the field that he was supposed to guard, thus gaining the wrath of the owner.

During the years 1629 and 1630, the country was facing severe famine. It was most difficult period The promissory notes dues for the family became dead letters of credit as nothing could be realised during the famine.

Tukaram lost his people and cattle. Very upset, he went to the Bhamnath forest nearby. For fifteen days he stayed there meditating on the Supreme Lord without any basic needs.

He realised the true knowledge with his auterities. The revelation made Tukaram more aware of the purpose of his life. He slowly withdrew his love for his household, wife and relations.

He gathered all the promissory notes and threw them into the Indrayani river, in spite of the protests of his relatives.

To continue... part 3 coming soon
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Surrey Mandir #Santtukaram Part 2 
संत तुकाराम - एक महान भक्त - भाग २
 अपने व्यवहार को देखकर, तुकाराम को घर से दूर जाने पर कुछ भी मूल्यवान नहीं सौंपा गया था।

 तुकाराम की पत्नी जीजाबाई ने उन्हें अपने गाँव में एक छोटी सी दुकान स्थापित करने में बार-बार मदद की, लेकिन वह तुकाराम द्वारा हमेशा आश्वस्त थीं कि सभी प्राणियों की सेवा करना, चाहे वह किसी भी मनुष्य, पशु, कीड़े आदि का एकमात्र लक्ष्य था।

 तुकाराम कीर्तन करते हुए दुकान में बैठते थे और अपने ग्राहकों के प्रति बहुत दयालु और ईमानदार थे।  हमेशा की तरह अपने साथी मनुष्यों पर दया करने के कारण, वह बहुत जल्द ही दिवालिया हो गया, क्योंकि उसने कभी अपने और परिवार के बारे में नहीं सोचा।

 संत तुकाराम ने भगवान पांडुरंगा को सभी प्राणियों में देखा।  एक बार उन्हें एक मकई के खेत की रखवाली करने के लिए कहा गया।  उन्हें यह नौकरी पसंद थी क्योंकि यह भगवान पांडुरंगा पर नामकीर्तन की उनकी आदत में बाधा नहीं थी।  पक्षी मानव उपस्थिति को देखते थे और कॉर्न्स को छूने के बिना उड़ जाते थे।

 लेकिन जैसे ही तुकाराम अपने अभंगों में डूबे, पक्षियों ने कॉर्न्स पर भोजन करना शुरू कर दिया।  सभी पक्षियों में पांडुरंगा को देखकर, उन्होंने पक्षियों को डराने के बजाय, पक्षियों को उस खेत से और अधिक मकानों के साथ खिलाया, जो वह पहरा दे रहे थे, इस प्रकार मालिक का क्रोध बढ़ रहा था।

 1629 और 1630 के वर्षों के दौरान, देश गंभीर अकाल का सामना कर रहा था।  यह सबसे कठिन अवधि थी परिवार के लिए वचन पत्र ऋण के मृत पत्र बन गए क्योंकि अकाल के दौरान कुछ भी महसूस नहीं किया जा सकता था।

 तुकाराम ने अपने लोगों और मवेशियों को खो दिया।  बहुत परेशान होकर वह पास के भामनाथ वन में गया।  पंद्रह दिनों तक वह बिना किसी बुनियादी ज़रूरत के परमपिता परमात्मा का ध्यान करता रहा।

 उन्होंने अपने ज्ञान के साथ सच्चे ज्ञान का एहसास किया।  रहस्योद्घाटन ने तुकाराम को अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में अधिक जागरूक बना दिया।  उन्होंने धीरे-धीरे अपने घर, पत्नी और संबंधों के लिए अपने प्यार को वापस ले लिया।

 उसने सभी वचन पत्र एकत्र किए और अपने रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद, इंद्रायणी नदी में फेंक दिया।
 
Sant Tukaram - A great devotee - Part 2

Seeing his behaviour, Tukaram was not entrusted with anything valuable when he went far from home.

Tukaram’s  wife Jijabai helped him  again and again to set up a small shop in his own village, but she was always convinced by Tukaram that serving all  the beings, no matter it was fellow human beings , animals, insects etc  was his only goal .

Tukaram used to sit in the shop doing  kirtan and being very kind and honest to his customers. As usual due to his  compassion  to his fellow humans, he became bankrupt very soon as he never thought of himself and family .

Sant Tukaram saw  Lord Panduranga in all creatures. Once he was asked to guard a corn field. He liked this job as it did not hinder with his habit of Namakirtan on Lord Panduranga. The birds would see human presence and fly away without touching the corns.

But as Tukaram got immersed in his abhangs, the birds started to feed on the corns. Seeing Panduranga in all the birds, he, instead of scaring the birds away, fed the birds with more corns from the field that he was supposed to guard, thus gaining the wrath of the owner.

During  the years 1629 and 1630, the country was  facing  severe famine.  It was most difficult period  The promissory notes  dues for  the family became dead letters of credit as nothing could be realised  during the  famine.

Tukaram lost his people and cattle. Very upset, he  went to the Bhamnath forest nearby. For fifteen days he stayed there  meditating on the Supreme Lord without  any basic needs.

He realised the true knowledge with his auterities. The revelation made  Tukaram  more aware of the purpose of his life. He slowly withdrew his  love for his household, wife and  relations.

He gathered all the promissory notes  and threw them into the Indrayani river, in spite of the protests of his relatives.

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2 days ago

Lakshmi Narayan Mandir, Surrey

Surrey Mandir
Live Evening Bhog Aarti & Darshan’s
#ShivMandir #JaiBholenath ll May 27 ll
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#व्रजकेभक्त....Surrey Mandir #truestory
#श्रीगौरदासबाबाजी...
नंदग्राम के पावन सरोवर के तीर पर श्री सनातन गोस्वामीपाद की भजन-कुटी में श्री गौरदास बाबा जी भजन करते थे।

वे सिद्ध पुरुष थे। नित्य प्रेम सरोवर के निकट गाजीपुर से फूल चुन लाते, और माला पिरोकर श्रीलाल जी को धारण कराते।

फूल-सेवा द्वारा ही उन्होंने श्री कृष्ण-कृपा लाभ की थी। कृपा-लाभ करने से चार-पांच वर्ष पूर्व ही से वे फूल-सेवा करते आ रहे थे।

आज उन्हें अभिमान हो आया -' इतने दिनों से फूल-सेवा करता आ रहा हूँ, फिर भी लाल जी कृपा नही करते।
उनका ह्रदय कठोर हैं किन्तु वृषभानु नन्दिनी के मन प्राण करुणा द्वारा ही गठित हैं।

इतने दिन उनकी सेवा की होती, तो वे अवश्य ही कृपा करती। अब मैं यहाँ न रहूँगा...आज ही बरसाना जी चला जाऊँगा।

संध्या के समय कथा आदि पीठ पर लाद कर चल पड़े, बरसाना जी की ओर। जब नंदगाँव से एक मील दूर एक मैदान से होकर चल रहे थे...

बहुत से ग्वाल-बाल गोचरण करा गाँव को लौट रहे थे, एक साँवरे रंग के सुंदर बालक ने उनसे पूछा-'बाबा ! तू कहाँ जाय ?

तब बाबा ने उत्तर दिया-' लाला ! हम बरसाने को जाय हैं, और बाबा के नैन डबडबा आये।

बालक ने रुक कर कुछ व्याकुलता से बाबा की ओर निहारते हुए कहा -' बाबा ! मत जा।'

बाबा बोले - ' न लाला ! मैं छः वर्ष यहाँ रहा, मुझे कुछ न मिला। अब और यहाँ रूककर क्या करूँगा.. ??

बालक ने दोनों हाथ फैलाकर रास्ता रोकते हुए कहा -' बाबा मान जा, मत जा।'

बाबा झुँझलाकर बोले -' ऐ छोरा ! काहे उद्धम करे हैं। रास्ता छोड़ दे मेरा। मोहे जान दे।

तब बालक ने उच्च स्वर में कहा-' बाबा ! तू जायेगा, तो मेरी फूल-सेवा कौन करेगा ...??

बाबा ने आश्चर्य से पलट कर पूछा-' कौन हैं रे तू ??

तो न वहाँ बालक, न कोई सखा और न ही कोई गैया।

बाबा के प्राण रो दिये ।हा कृष्ण ! हा कृष्ण ! कह रोते-चीखते भूमि पर लोटने लगे। चेतना खो बैठे।

और फिर चेतना आने पर...हा कृष्ण ! हाय रे छलिया ! कृपा भी की, तो छल से।

यदि कुछ देर दर्शन दे देते, तो तुम्हारी कृपा का भण्डार कम हो जाता क्या ??

पर नही दीनवत्सल ! तुम्हारा नही ,यह मेरा ही दोष हैं।

इस नराधम में यह योग्यता ही कहाँ, जो तुम्हे पहचान पाता ?

वह प्रेम और भक्ति ही कहाँ ?

जिसके कारण तुम रुकने को बाध्य होते।
उधर पुजारी जी को आदेश हुआ -' देखो, गौरदास मेरी फूल-सेवा न छोड़े। मैं किसी और की फूल-सेवा स्वीकार नही करूँगा।

Devotees of Vraj ....

Mr. Gourdas Baba Ji ...

On the arrow of the holy lake of Nandagram, Shri Gourdas Baba Ji used to worship in the hymn of Shri Sanatan Goswamipada.

He was a perfect man. They used to pick flowers from Gazipur near the Prem Sarovar, and garlanded Shree Lal Ji.

He had benefited Shri Krishna-Kripa only through flower-service. They had been doing flower service for four-five years before doing mercy.

Today he became proud - 'I have been serving flowers for so many days, yet Lal Ji does not please.
His heart is hard, but the mind of Vrishabhanu Nandini is formed only by the soul compassion.

Had she served him for so many days, she would have been very kind. Now I will not stay here ... Today I will go to Barsana ji.

In the evening, Katha etc. started loading up on the back, towards Barsana ji. When walking through a field about a mile away from Nandgaon ...

Many Gwal-Bal Gocharan were returning to the village, a beautiful colored child asked them - Baba! Where do you go?

Then Baba replied- 'Lala! We are going to rain, and Baba's Nain came to the bin.

The child stopped and stared at Baba with some distraction and said - 'Baba! Do not go. '

Baba said - 'No Lala! I lived here for six years, I could not find anything. What will I stop here and now .. ??

The child spread both hands and stopped the way and said - 'Baba, agree, don't go.'

Baba said angrily - 'Hey Chora! What are you doing? Leave my way. Give life

Then the child said in a loud voice- 'Baba! If you go, who will serve me flowers ... ??

Baba turned in surprise and asked- 'Who are you?

Neither the boy nor the friend nor anyone sang there.

Wept Baba's life. O Krishna! Yes, Krishna! Saying that weeping and rolling on the ground. Lost consciousness.

And then on coming to consciousness ... Yes Krishna! Hi ray cam Pleased too, so deceitfully.

If you had appeared for some time, would your store of grace be reduced?

But not Dinavatsal! Not yours, this is my fault.

Where is this ability in this Naradham, who would recognize you?

Where is that love and devotion?

Because of which you would be forced to stop.
On the other hand, the priest was ordered - 'Look, Gourdas should not leave my flower service. I will not accept any other flower service.

कैसे मान लूँ की
तू पल पल में शामिल नहीं.
कैसे मान लूँ की
तू हर चीज़ में हाज़िर नहीं.
कैसे मान लूँ की
तुझे मेरी परवाह नहीं.
कैसे मान लूँ की
तू दूर है पास नहीं.
देर मैने ही लगाईं
पहचानने में मेरे ईश्वर.
वरना तूने जो दिया

उसका तो कोई हिसाब ही नहीं.
जैसे जैसे मैं सर को झुकाता चला गया
वैसे वैसे तू मुझे उठाता चला गया....
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#व्रजकेभक्त....Surrey Mandir #truestory
#श्रीगौरदासबाबाजी...
नंदग्राम के पावन सरोवर के तीर पर श्री सनातन गोस्वामीपाद की भजन-कुटी में श्री गौरदास बाबा जी भजन करते थे।

वे सिद्ध पुरुष थे। नित्य प्रेम सरोवर के निकट गाजीपुर से फूल चुन लाते, और माला पिरोकर श्रीलाल जी को धारण कराते।

फूल-सेवा द्वारा ही उन्होंने श्री कृष्ण-कृपा लाभ की थी। कृपा-लाभ करने से चार-पांच वर्ष पूर्व ही से वे फूल-सेवा करते आ रहे थे।

आज उन्हें अभिमान हो आया - इतने दिनों से फूल-सेवा करता आ रहा हूँ, फिर भी लाल जी कृपा नही करते।
उनका ह्रदय कठोर हैं किन्तु वृषभानु नन्दिनी के मन प्राण करुणा द्वारा ही गठित हैं। 

इतने दिन उनकी सेवा की होती, तो वे अवश्य ही कृपा करती। अब मैं यहाँ न रहूँगा...आज ही बरसाना जी चला जाऊँगा।

संध्या के समय कथा आदि पीठ पर लाद कर चल पड़े, बरसाना जी की ओर। जब नंदगाँव से एक मील दूर एक मैदान से होकर चल रहे थे...

बहुत से ग्वाल-बाल गोचरण करा गाँव को लौट रहे थे, एक साँवरे रंग के सुंदर बालक ने उनसे पूछा-बाबा ! तू कहाँ जाय ?

तब बाबा ने उत्तर दिया- लाला ! हम बरसाने को जाय हैं, और बाबा के नैन डबडबा आये।

बालक ने रुक कर कुछ व्याकुलता से बाबा की ओर निहारते हुए कहा - बाबा ! मत जा।

बाबा बोले -  न लाला ! मैं छः वर्ष यहाँ रहा, मुझे कुछ न मिला। अब और यहाँ रूककर क्या करूँगा.. ??

बालक ने दोनों हाथ फैलाकर रास्ता रोकते हुए कहा - बाबा मान जा, मत जा।

बाबा झुँझलाकर बोले - ऐ छोरा ! काहे उद्धम करे हैं। रास्ता छोड़ दे मेरा। मोहे जान दे।

तब बालक ने उच्च स्वर में कहा- बाबा ! तू जायेगा, तो मेरी फूल-सेवा कौन करेगा ...??

बाबा ने आश्चर्य से पलट कर पूछा- कौन हैं रे तू ?? 

तो न वहाँ बालक, न कोई सखा और न ही कोई गैया।

बाबा के प्राण रो दिये ।हा कृष्ण ! हा कृष्ण ! कह रोते-चीखते भूमि पर लोटने लगे। चेतना खो बैठे।

और फिर चेतना आने पर...हा कृष्ण ! हाय रे छलिया ! कृपा भी की, तो छल से।

यदि कुछ देर दर्शन दे देते, तो तुम्हारी कृपा का भण्डार कम हो जाता क्या ??

 पर नही दीनवत्सल ! तुम्हारा नही ,यह मेरा ही दोष हैं।

इस नराधम में यह योग्यता ही कहाँ, जो तुम्हे पहचान पाता ?

 वह प्रेम और भक्ति ही कहाँ ?

 जिसके कारण तुम रुकने को बाध्य होते।
उधर पुजारी जी को आदेश हुआ - देखो, गौरदास मेरी फूल-सेवा न छोड़े। मैं किसी और की फूल-सेवा स्वीकार नही करूँगा।

Devotees of Vraj ....

 Mr. Gourdas Baba Ji ...

 On the arrow of the holy lake of Nandagram, Shri Gourdas Baba Ji used to worship in the hymn of Shri Sanatan Goswamipada.

 He was a perfect man.  They used to pick flowers from Gazipur near the Prem Sarovar, and garlanded Shree Lal Ji.

 He had benefited Shri Krishna-Kripa only through flower-service.  They had been doing flower service for four-five years before doing mercy.

 Today he became proud - I have been serving flowers for so many days, yet Lal Ji does not please.
 His heart is hard, but the mind of Vrishabhanu Nandini is formed only by the soul compassion.

 Had she served him for so many days, she would have been very kind.  Now I will not stay here ... Today I will go to Barsana ji.

 In the evening, Katha etc. started loading up on the back, towards Barsana ji.  When walking through a field about a mile away from Nandgaon ...

 Many Gwal-Bal Gocharan were returning to the village, a beautiful colored child asked them - Baba!  Where do you go?

 Then Baba replied- Lala!  We are going to rain, and Babas Nain came to the bin.

 The child stopped and stared at Baba with some distraction and said - Baba!  Do not go. 

 Baba said - No Lala!  I lived here for six years, I could not find anything.  What will I stop here and now .. ??

 The child spread both hands and stopped the way and said - Baba, agree, dont go.

 Baba said angrily - Hey Chora!  What are you doing?  Leave my way.  Give life

 Then the child said in a loud voice- Baba!  If you go, who will serve me flowers ... ??

 Baba turned in surprise and asked- Who are you?

 Neither the boy nor the friend nor anyone sang there.

 Wept Babas life. O Krishna!  Yes, Krishna!  Saying that weeping and rolling on the ground.  Lost consciousness.

 And then on coming to consciousness ... Yes Krishna!  Hi ray cam  Pleased too, so deceitfully.

 If you had appeared for some time, would your store of grace be reduced?

  But not Dinavatsal!  Not yours, this is my fault.

 Where is this ability in this Naradham, who would recognize you?

  Where is that love and devotion?

  Because of which you would be forced to stop.
 On the other hand, the priest was ordered - Look, Gourdas should not leave my flower service.  I will not accept any other flower service.

कैसे मान लूँ की
तू पल पल में शामिल नहीं.
कैसे मान लूँ की
तू हर चीज़ में हाज़िर नहीं.
कैसे मान लूँ की
तुझे मेरी परवाह नहीं.
कैसे मान लूँ की
तू दूर है पास नहीं.
देर मैने ही लगाईं
पहचानने में मेरे ईश्वर.
वरना तूने जो दिया

उसका तो कोई हिसाब ही नहीं.
जैसे जैसे मैं सर को झुकाता चला गया
वैसे वैसे तू मुझे उठाता चला गया....

2 days ago

Lakshmi Narayan Mandir, Surrey

Surrey Mandir
Live Morning Aarti & Darshan’s
#JaiLakshmiNaryanBhagwan ll May 27 ll
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2 days ago

Lakshmi Narayan Mandir, Surrey

Surrey Mandir
Live Morning Aarti & Darshan’s
#ShivMandir #Jaibholenath ll May 27 ll
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Surrey Mandir #SantTukaRamPart -1
संत तुकाराम - कृष्ण के एक महान भक्त - भाग 1

जब कोई पवित्र स्थान पंढरपुर के बारे में सोचता है, तो भगवान विट्ठल के दर्शन करने के लिए मन दौड़ जाता है और जब अपने भक्तों के बारे में जानने की खोज शुरू होती है, तो महान संत संत तुकाराम की जीवनी एक भक्त की आंखों में आंसू ला देती है।

संत तुकाराम वर्ष 1608 में पुणे जिले के एक छोटे से गाँव देहू में दिखाई दिए, जो एक अन्य महत्वपूर्ण स्थान अलंदी से सात मील की दूरी पर है - एक और महान संत जनेश्वर की समाधि।

तुकाराम ने बचपन से ही पंढरपुर के भगवान विट्ठल (पांडुरंगा-कृष्ण) की पूजा की थी।

उनके बुजुर्गों ने अपने स्वयं के एक छोटे से मंदिर का निर्माण किया और इसे भगवान विट्ठल को समर्पित किया। उनके परिवार के सदस्यों ने, कई पीढ़ियों से, पंढरपुर के 'वारी' में भाग लिया था, अर्थात, आषाढ़ के महीने के ग्यारहवें दिन (जून-जुलाई) और फिर कार्तिक महीने के ग्यारहवें दिन पंढरपुर की वार्षिक तीर्थयात्रा। (अक्टूबर - नवंबर)।

जब तुकाराम लगभग सत्रह साल के थे, उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया और उस समय के बारे में, उनके बड़े भाई ने गांव छोड़ दिया और मोक्ष की तलाश में वाराणसी चले गए। अगले कुछ साल, तुकाराम के लिए बहुत कठिन थे।

उसकी मन: स्थिति का लाभ उठाते हुए, देनदार उसके कारण जो कुछ भी चुकाते थे उसे नहीं चुकाते थे और लेनदार उनके कारण पैसे के लिए परेशान करने लगे।

तुकाराम ने व्यापार के कई उपक्रमों में अपना हाथ आजमाया और खाली हाथ या नुकसान के साथ वापस आ गए क्योंकि वे सरलता और इंसानियत के मूल में थे।

चालबाजों द्वारा उसका सब कुछ लूट लिया गया, जिसने उसे अपने पास मौजूद सभी धन के बदले में पीतल के आभूषण दिए।

वह एक साधारण व्यक्ति था जो दूसरों के दुखों को नहीं देख सकता था। एक अवसर पर, घर लौटकर, वह एक गरीब आदमी और उसके परिवार को भूख से मर गया। वह उनकी दुर्दशा नहीं देख सकता था। उसने सिर्फ लाभ के साथ-साथ मूलधन भी दिया जो उसकी पत्नी ने कुछ छोटे व्यवसाय के लिए उधार लिया था।

To be continued

Saint Tukaram - a great devotee of Krishna - Part 1

When one thinks of Pandharpur, a sacred place, the mind rushes to see Lord Vitthal and when the quest to know about his devotees begins, the biography of the great saint Tukaram tears into the eyes of a devotee. It brings.

Sant Tukaram appeared in the year 1608 in Dehu, a small village in Pune district, which is seven miles from Alandi, another important place - the tomb of another great saint, Janeshwar.

Tukaram worshiped Lord Vitthal (Panduranga-Krishna) of Pandharpur since childhood.

His elders built a small temple of their own and dedicated it to Lord Vitthal. Members of his family had, for many generations, participated in the ‘Wari’ of Pandharpur, that is, the eleventh day of the month of Ashadh (June – July) and then the annual pilgrimage to Pandharpur on the eleventh day of the month of Kartik. (October - November).

When Tukaram was around seventeen years old, he lost his parents and about that time, his elder brother left the village and moved to Varanasi in search of salvation. The next few years were very difficult for Tukaram.

Taking advantage of his state of mind, the debtors did not pay what he owed him and the creditors started harassing him for money because of him.

Tukaram tried his hand at many business ventures and came back empty-handed or with a loss because he was at the core of simplicity and humanity.

He was robbed of everything by the tricksters, who gave him brass jewelery in exchange for all the money he had.

He was an ordinary man who could not see the sufferings of others. On one occasion, returning home, he died starving a poor man and his family. He could not see their plight. He gave only the profits as well as the principal that his wife had borrowed for some small business.

To continue.....
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Surrey Mandir #SantTukaRamPart -1
संत तुकाराम - कृष्ण के एक महान भक्त - भाग 1

 जब कोई पवित्र स्थान पंढरपुर के बारे में सोचता है, तो भगवान विट्ठल के दर्शन करने के लिए मन दौड़ जाता है और जब अपने भक्तों के बारे में जानने की खोज शुरू होती है, तो महान संत संत तुकाराम की जीवनी एक भक्त की आंखों में आंसू ला देती है।

 संत तुकाराम वर्ष 1608 में पुणे जिले के एक छोटे से गाँव देहू में दिखाई दिए, जो एक अन्य महत्वपूर्ण स्थान अलंदी से सात मील की दूरी पर है - एक और महान संत जनेश्वर की समाधि।

 तुकाराम ने बचपन से ही पंढरपुर के भगवान विट्ठल (पांडुरंगा-कृष्ण) की पूजा की थी।

 उनके बुजुर्गों ने अपने स्वयं के एक छोटे से मंदिर का निर्माण किया और इसे भगवान विट्ठल को समर्पित किया।  उनके परिवार के सदस्यों ने, कई पीढ़ियों से, पंढरपुर के वारी में भाग लिया था, अर्थात, आषाढ़ के महीने के ग्यारहवें दिन (जून-जुलाई) और फिर कार्तिक महीने के ग्यारहवें दिन पंढरपुर की वार्षिक तीर्थयात्रा।  (अक्टूबर - नवंबर)।

 जब तुकाराम लगभग सत्रह साल के थे, उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया और उस समय के बारे में, उनके बड़े भाई ने गांव छोड़ दिया और मोक्ष की तलाश में वाराणसी चले गए।  अगले कुछ साल, तुकाराम के लिए बहुत कठिन थे।

 उसकी मन: स्थिति का लाभ उठाते हुए, देनदार उसके कारण जो कुछ भी चुकाते थे उसे नहीं चुकाते थे और लेनदार उनके कारण पैसे के लिए परेशान करने लगे।

 तुकाराम ने व्यापार के कई उपक्रमों में अपना हाथ आजमाया और खाली हाथ या नुकसान के साथ वापस आ गए क्योंकि वे सरलता और इंसानियत के मूल में थे।

 चालबाजों द्वारा उसका सब कुछ लूट लिया गया, जिसने उसे अपने पास मौजूद सभी धन के बदले में पीतल के आभूषण दिए।

 वह एक साधारण व्यक्ति था जो दूसरों के दुखों को नहीं देख सकता था।  एक अवसर पर, घर लौटकर, वह एक गरीब आदमी और उसके परिवार को भूख से मर गया।  वह उनकी दुर्दशा नहीं देख सकता था।  उसने सिर्फ लाभ के साथ-साथ मूलधन भी दिया जो उसकी पत्नी ने कुछ छोटे व्यवसाय के लिए उधार लिया था।

To be continued 

Saint Tukaram - a great devotee of Krishna - Part 1

  When one thinks of Pandharpur, a sacred place, the mind rushes to see Lord Vitthal and when the quest to know about his devotees begins, the biography of the great saint Tukaram tears into the eyes of a devotee.  It brings.

  Sant Tukaram appeared in the year 1608 in Dehu, a small village in Pune district, which is seven miles from Alandi, another important place - the tomb of another great saint, Janeshwar.

  Tukaram worshiped Lord Vitthal (Panduranga-Krishna) of Pandharpur since childhood.

  His elders built a small temple of their own and dedicated it to Lord Vitthal.  Members of his family had, for many generations, participated in the ‘Wari’ of Pandharpur, that is, the eleventh day of the month of Ashadh (June – July) and then the annual pilgrimage to Pandharpur on the eleventh day of the month of Kartik.  (October - November).

  When Tukaram was around seventeen years old, he lost his parents and about that time, his elder brother left the village and moved to Varanasi in search of salvation.  The next few years were very difficult for Tukaram.

  Taking advantage of his state of mind, the debtors did not pay what he owed him and the creditors started harassing him for money because of him.

  Tukaram tried his hand at many business ventures and came back empty-handed or with a loss because he was at the core of simplicity and humanity.

  He was robbed of everything by the tricksters, who gave him brass jewelery in exchange for all the money he had.

  He was an ordinary man who could not see the sufferings of others.  On one occasion, returning home, he died starving a poor man and his family.  He could not see their plight.  He gave only the profits as well as the principal that his wife had borrowed for some small business.

  To continue.....
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